न जाने क्यों पल रही है अंदर एक अजीब सी बेचैनी,
नींद भी न जाने क्यों है यहाँ रूठी,
रात के सन्नाटे को चीरता हुआ हवा का एक तेज़ झोंका,
ले ही आया अपने साथ एक यादों का छोटा सा पिटारा,
३-४ रास्ते तो आ रहे हैं कुछ नज़र,
कुछ लुभावने तो कुछ जर्जर;
पर कमबख्त दिल को ये भी नहीं आभास,
कि कैसी मंज़िल की है उसे तलाश;
यूँ पथ्थर का यार हो गया है वो,
और इसी तरह वो सफर के खूसूरत नजारों को भी,
कर देता है वो अब नज़रअंदाज़;
कुछ इस तरह निकलती है फिर से वही एक कराह,
जाएँ तो किस दिशा में जाएँ, किस दिशा में जाएँ और दिल,
दिल, आखिर तू क्या चाहता है!
~ सिद्धार्थ
नींद भी न जाने क्यों है यहाँ रूठी,
रात के सन्नाटे को चीरता हुआ हवा का एक तेज़ झोंका,
ले ही आया अपने साथ एक यादों का छोटा सा पिटारा,
३-४ रास्ते तो आ रहे हैं कुछ नज़र,
कुछ लुभावने तो कुछ जर्जर;
पर कमबख्त दिल को ये भी नहीं आभास,
कि कैसी मंज़िल की है उसे तलाश;
यूँ पथ्थर का यार हो गया है वो,
और इसी तरह वो सफर के खूसूरत नजारों को भी,
कर देता है वो अब नज़रअंदाज़;
कुछ इस तरह निकलती है फिर से वही एक कराह,
जाएँ तो किस दिशा में जाएँ, किस दिशा में जाएँ और दिल,
दिल, आखिर तू क्या चाहता है!
~ सिद्धार्थ
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