Saturday, April 9, 2016

वो किताब

एक और दिन, एक और नयी सुबह, 
ज़िन्दगी की किताब में मौजूदा अध्याय का एक और नया पन्ना;
एक ऐसी किताब, जहाँ पहले से ही हमारे लिए लिखा गया है कुछ-कुछ, 
पर आज़ादी है हमें बाकी का फ़साना खुद लिखने की , 
मौका है कि अपनी कहानी हम खुद बनायें,
जो बन भी सकती है एक मिसाल;
पर अक्सर इस भाग-दौड़ वाली जीवनशैली में, 
जहाँ हमारा लक्ष्य आमतौर पर बस उत्तरजीविता (survival) है,
अपनी कल्पना और मकसद से बिछड़ जाते हैं, 
उन्हें ढूंढते ढूंढते भटक जाते हैं हम,
फिर वही पहले से लिखे हुए चीज़ों के आधार पर पलटने लगते हैं पन्ने,
और भूल जाते हैं उनको पलटते हुए कि किताब का अंत आना कभी न कभी तय है, 
कभी भी नष्ट या गुम हो सकती है वो.
हालात और परम्पराएँ साधारणत: हमें अपने आप को इस तरह कर देती है ढाल देने पर मज़बूर , 
कि वहाँ तक आने से पहले ही हम पन्नों और अध्यायों पर लगा लेते हैं पृष्ठ-स्मृति (bookmark),
और हर एक पृष्ठ-स्मृति के ऊपर एक पहले से अनुसरण किया जा रहा निर्देशों का एक जथ्था;
जो कर लेती हैं चमकीले अक्षरों से हमें अपने आगोश में;

आज कल्पना से फिर से मोहब्बत करने की जाग उठी वो चाह ,
साथ में उद्देश्य को भी रहा हूँ मैं खोज, और यहीं कहीं आसपास ही है वो;
बस इस भीड़ में पहचान नहीं पा रहा था उसे, और अजीब सी विडम्बना है ये,
कि वहाँ तन्हाई हमेशा ही आँखों के सामने रहती है, 
और वक़्त के साथ और भी हो जा रही है करीब;

'उस' किताब में लिख डालनी है अपनी एक अलग कहानी, 
नहीं बनने देना उसे एक और नक़ल की वही पुरानी कॉपी;
पहले से लिखे हुए सारे अंशों को नहीं मान लेना है पथ्थर की लकीरें,
करनी है मकसद से यारी, 
लिख डालनी है वो किताब,
लिख डालनी है वो किताब..
 
  

  







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